
पौड़ी गढ़वाल:- उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल स्थित वीर चंद्र सिंह गढ़वाली औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय (UUHF), भरसार में एक छात्रा की दुखद मौत के बाद छात्रों में भारी आक्रोश है। आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की घोर लापरवाही, कैंपस में चिकित्सक का न होना और समय पर एंबुलेंस न मिलने के कारण बीएससी (B.Sc) चतुर्थ वर्ष की छात्रा मधु यादव की जान चली गई।
क्या है पूरा मामला?
मूल रूप से पंतनगर की रहने वाली मधु यादव भरसार स्थित उद्यानिकी महाविद्यालय में बीएससी की पढ़ाई कर रही थीं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, 26 अगस्त से मधु की तबीयत खराब चल रही थी। आरोप है कि 26 से 29 अगस्त तक महाविद्यालय की ओर से उन्हें कोई सही उपचार नहीं मिला। जब हालत ज्यादा बिगड़ी तो सिस्टम की लाचारी ने छात्रा की जान ले ली।

स्टाफ की बेरुखी और अस्पतालों के चक्कर
पाबौ अस्पताल रेफर: 29 अगस्त की शाम 7:00 बजे मधु की तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर उन्हें भरसार के औषधालय से पाबौ अस्पताल भेजा गया। छात्रों का आरोप है कि कॉलेज के स्टाफ शंकर बिष्ट और अधिष्ठाता (Dean) को पता था कि पाबौ में डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी उन्हें वहां भेजा गया।
स्टाफ ने छोड़ा अकेला: आरोप है कि शंकर बिष्ट और कॉलेज के वाहन चालक त्रिलोक सिंह पाबौ अस्पताल में बीमार छात्रा को अकेला छोड़कर वापस लौट आए। यहां एक दंत चिकित्सक (Dentist) द्वारा उनका इलाज किया गया।
सहपाठियों के भरोसे छोड़ा: मधु की माता के निवेदन पर अधिष्ठाता ने मधु की सहेलियों (नेहा रावत और अनीषा) को रात 1:00 बजे उनके पास पाबौ भेजा। लेकिन कॉलेज का कोई जिम्मेदार स्टाफ, वॉर्डन डॉ. तरु नेगी या भरसार की नर्स प्रीति उनके साथ नहीं गईं।
एम्बुलेंस का इंतजार और एम्स में मौत
पाबौ में उपचार के बाद छात्रा को पौड़ी रेफर कर दिया गया। पौड़ी पहुंचने के बाद उन्हें फिर से श्रीनगर गढ़वाल मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया।
एंबुलेंस के लिए इंतजार: पौड़ी से श्रीनगर जाने के लिए बीमार छात्रा को रात 2:00 बजे से 3:00 बजे तक (एक घंटे) मात्र एंबुलेंस का इंतजार करना पड़ा।
श्रीनगर में इलाज: श्रीनगर अस्पताल में एक प्रशिक्षु (MBBS) चिकित्सक ने उनका इलाज किया, जहां उनका शुगर स्तर 236 पाया गया।
एम्स में तोड़ा दम: 30 अगस्त की सुबह 9:00 बजे मधु की माता जी श्रीनगर अस्पताल पहुंचीं, जहां उन्हें भी एक घंटा इंतजार करना पड़ा। स्थिति गंभीर होने पर छात्रा को एम्स (AIIMS) ऋषिकेश रेफर किया गया, लेकिन दुर्भाग्यवश वहां पहुंचते ही छात्रा की मृत्यु हो गई।
विश्वविद्यालय प्रशासन पर उठते गंभीर सवाल
इस दर्दनाक घटना ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
जब से महाविद्यालय बना है, तब से आज तक कैंपस में एक भी स्थायी चिकित्सक (Permanent Doctor) उपलब्ध क्यों नहीं है?
छात्रा की तबीयत बिगड़ने पर वॉर्डन और जिम्मेदार कॉलेज स्टाफ ने अपनी ड्यूटी क्यों नहीं निभाई?
इतनी गंभीर हालत में एक छात्रा को सिर्फ उसके सहपाठियों के भरोसे कैसे छोड़ दिया गया?
छात्रा की मौत के बाद कैंपस के छात्रों में गहरा रोष है और वे विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।









